Monday, May 6, 2013

हम वाकई इतने गरीब हैं या हमारी सोच ही गरीब?

आज तक मेरी समझ में सरकार द्वारा २८  फरवरी को कियजाने वाले नाटक, जिसे कई लोग बजट के नाम से जानते हैं,  का ओचित्य समझ में नहीं आ पायापूरे ३64  दिन के इंतज़ार के .बाद हर साल ही यह नाटक होता है। ये शायद मेरा ही दुर्भाग्य है की इस में मेरी समझ मेरा साथ नहीं देती। जी हाँ, ये मेरा दुर्भाग्य ही है की मैं इतना शिक्षित नहीं हूँ की इतनी उच्च स्तरीय चीज़ को समझ सकु। मैं तो  निम्न आर्थिक वर्ग से ताल्लुक रखने वाला एक  अति सामान्य सा भारतीय हूँ जिस के जीवन के किसी भी पल में अपनी आजीविका के वारे में सोचने की अतिरिक्त और कुछ सोचने का समय ही नहीं है. किन्तु क्या करूँ पहले वित्त मंत्री का लंबा चोड़ा भाषण और सत्ता पक्ष पैरवी फिर विपक्ष की आलोचना, उस के बाद अखबारों में छपने वाले लम्बे चोड़े आर्टिकल मेरी अल्पबुधी को यह सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं की इस में ज़रूर कुछ न कुछ ख़ास होना ही चाहिए। यह विचार मन में आते ही दिमाग ने सोचना शुरू कर दियाके इस बजट से मेरा ( एक  अति सामान्य सा भारतीय ) क्या भला या बुरा हो सकता है ? भला तो क्या होगा जब प्याज ८ से २५ आटा  १३  से २६,  तेल तो तीन अंकों के आकडे को छू रहा है, अगर “उस” (ऊपर वाले/सरकार ) की मर्जी हुई तो २० १ ४   की आखीर तक पेट्रोल भी सौ का आंकड़ा छू ही लेगा, देसी घी तो जब से ३० ० रूपए किलो हुआ है उस के वारे में तो मेने सोचना ही छोड दिया है। अब तो मंदिर में दिया भी रिफाइंड या डालडा का जलाने लगा हूँ, क्या करूँ जब देने वाला देता ही नहीं है तो में भी उसे कहाँ से लौताऊं ? फिर विचार आता है की “वो” इतना निर्दयी तो नहीं हो सकता की देने में इतनी कोताही करे. वो तो निश्चित रूप से देता है पर ये कमबखत बीच वाले उसे मेरे तक पहुँचने ही नहीं देते। जब इसी तरह की  पता नहीं कितनी बातें दिमाग में घुमड़ने लगीं तो अचानक एसा लगा के अगर थोड़ी देर एसे ही चला तो निश्चित रूप से मेरे दिमाग की हार्ड डिस्क क्रेश कर जाय गी, लिहाजा इन सब सोचों को तिलांजली दे कर मेने दिमाग को रीस्टार्ट किया और अपनी अप्ल बुध्ही से यह विचार करने लगा की इस बजटिये नाटक में फिलहाल हो क्या रहा है? और इस में होना क्या चाहिए जिस से  मेरा ( एक  अति सामान्य सा भारतीय ) भी कुछ भला हो।

वैसे मेरे सोचने से होता भी क्या है, हमारे देश में तो वेचारे प्रधानमंत्री की भी कोई नहीं सुनता तो फिर मेरी विसात ही क्या है? फिर भी जब सोचने का सोच ही लिया है तो सोचना तो पडेगा। फिर क्या था पिछले कई  दिन के अखबार उठा लिए और उन में से आंकड़े जमा करने लगा। इस से जो लव्वोलुआब निकला वो खुद मरी ही समझ में नहीं आया अतः वो आप की सेवा में विचारार्थ प्रस्तुत कर रहां हूँ और आशा करता हूँ की आप इन आकड़ों की व्याख्या कर के मेरा ज्ञान वर्धन करेङ्गे.

इस बजट में सब से प्रमुख अपेक्षा थी के सरकार आय कर में छूट की सीमा को पांच लाख तक बड़ा सकती है,किन्तु सरकार ने यह तर्क दिया की दो से पांच लाख तक आय वर्ग में आय कर दाताओं का ८९ % है, जिन्हें कर मुक्त करने से सरकार को राजस्व की अपूरणीय क्षति हो सकती है.   इन करदाताओमें भी बहुमत उन का है ं जो मात्र पचास से एक हज़ार तक कर चुका कर देश के प्रति अपने कर्तव्य से मुक्त होने के अहसास से आनंदित हो लेते हैं

हमारे देश की लघभग सवा अरब जन संख्या में से केवल २.६ ६  % ( केवल ३ करोड़ २ ४ लाख ) लोग ही टेक्स देते हैं। देश की केवल १.३ % आवादी ही बीस लाख या उस से अधिक सालाना कमा पाती है. मुझे तो यह लिख कर और सोच कर ही शर्म आ रही है के हमारी देश के प्रति सोच को क्या हो गया है . हम में से केवल ढाई प्रतिशत लोग ही देश के निर्माण में अपना सहयोग देने की “खानापूरी” करने में सक्षम हैं। अब यह एक यक्ष प्रशन है की हम वाकई इतने गरीब हैं या हमारी सोच ही गरीब?
क्या
आज यह वास्तविकता किसी से भी छुपी नहीं है की हमारे देश की कुल उत्पादकता की बराबर या कमोवेश धन हमारे नौकरशाह और राज्नेतिग्य हर साल देश के बाहर भेज देते हैं। कोई भी अंतर्राष्ट्रीय खरीद हो या स्थानीय, किसी भी काम का ठेका या परमिट हो  उस में हमारे नौकरशाह और राज्नेतिग्य कमीशन लेने से बाज़ नहीं आ सकते। कुछ मामलों में तो इस कमीशन का अनुपात दालऔरं नमक का नहीं अपितु नमक और दाल का हो जाता है. कई मामले तो ऐसे भी सामने ए हैं जिन में पूरी दिलेरी से कम,ईशान का तो लेनदेन हो गया किन्तु काम केवल कागजों में ही हो पाया या फाइलों ने ही  उलझा रहा। किसी भी सरकारी महकमे में कोई काम करवाना हो तो बिना दस्तूरी या चडावे के काम हो जाय इस बात की कितनी संभावना है इस से भी कोई नावाकिफ नहीं है.   

यह तो बस भ्रस्टाचार की बानगी भर है वास्तविकता तो कहीं अधिक भयाभव है। अगर सरकारी नज़रिए से देखें तो यह गलत भी नहीं है की अगर सरकार टेक्स नहीं लगाएगी तो उस के पास विकास योजनाओं के क्रियान्वन के लिए पैसा कहाँ से आये गा?  

मेरी समझ में इन विकास योजनाओं के लिए  आवश्यक धन के प्रबंधन के लिए गरीबों पर टेक्स लगाना ही एक मात्र विकल्प नहीं है. यदि इक्षा शक्ति मज़बूत हो और द्रण संकल्प के साथ इस समस्या के समाधान के प्रति हमारे नीति निर्धारक नेता तथा नौकरशाह विचार करे तो    तो इस के अलावा भी कई समाधान निकल सकते है। उदाहरण के लिए कुछ रास्ते मेरी भी समझ में आ रहे हैं, अब ये कितने कारआमद साबित होंगे इस पर विचार करने के लिए कम से कम में तो सक्षम नहीं हुन.  

१.     यदि हमारे नेता तथा नौकरशाह विदेर्शों में जमा भारतीय संपदा हो किसी प्रकार वापस ला सकें तो इस का स्थाई समाधान संभव है। वैसे इस विचार के क्रियान्वन की कल्पना करना फिलहाल तो पानी पर मलाई जमाने की कल्पना करने के सामान है. हमारे देश के नौकर शाह त्यथा राजनीतिग्य तो स्वयं इतने भ्रष्ट हैं के उन से किसी नैतिकता की आशा करना व्यर्थ है. हमारी केंद्र सरकार की एक विज्ञप्ति के अनुसार केंद्र सरकार की तमाम चेतावनियों के बावजूद कार्रवाई न होने से बेखौफ एक हजार से ज्यादा आइएएस अधिकारियों ने 2012 के लिए भी तय सीमा में अचल संपत्ति का रिटर्न [आइपीआर] दाखिल नहीं किया। ब्योरा न देने वाले 1057 लोकसेवकों में सर्वाधिक 147 उत्तर प्रदेश कैडर के हैं।

सिविल सेवा नियमों के मुताबिक, सभी अफसरों को जनवरी से दिसंबर तक संपत्ति के रिटर्न का ब्योरा देना जरूरी होता है। ऐसा नहीं करने पर उन अधिकारियों की प्रोन्नति या उच्च स्तर के पदों पर नियुक्ति से वंचित किया जा सकता है (जिस की उन लोगो ने कभी भी कोई चिंता नहीं की, क्योंकी लगभग  ये सभी अधिकारी वर्तमान में इतने मलाई दार पदों पर आसीन हैं की उन को पदोन्नति का कोई लालच ही नहीं है बल्कि कई बार तो ये अधिकारी अपनी पदोन्नति करवाने के लिए नहीं अपितु पदोन्निति रुकवाने के लिए भी लाखों करोड़ों खर्च करने में संकोच नहीं करते)। इन अफसरों की बेफिक्री का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 107 आइएएस ऐसे भी हैं जिन्होंने 2011 का रिटर्न भी दाखिल नहीं किया, जबकि वर्ष 2010 का आइपीआर न देने वालों की तादाद 198 है। इन अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही करने वाले भी सामान विचारधारा रखने वाले लोग हैं, अतः किसी भी प्रकार की कार्यवाही के प्रति वे निश्चिन्त है।

कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मिजोरम, केंद्र शासित प्रदेशों के कैडर के 114, मणिपुर-त्रिपुरा के 100, जम्मू-कश्मीर के 96 और मध्य प्रदेश कैडर के 88 अधिकारियों का नाम सूची में शामिल है। डिफाल्टर अफसरों की सूची में मध्य प्रदेश कैडर के निलंबित आइएएस दंपति अरविंद और टीनू जोशी का भी नाम है। 1979 बैच के जोशी दंपति फरवरी 2010 में उस समय सुर्खियों में आए थे जब उनके ठिकानों पर छापे के दौरान आयकर विभाग 350 करोड़ से अधिक की संपत्ति का पता चला था। यह निशित है की एक तो छापे में उन की संपत्ति का छोटा सा हिस्सा ही आय कर अधिकारियों की पकड़ में आया होगा और दुसरे उन के द्वारा भ्रष्ट आचरण से अर्जित संपत्ति, पकड़ी गई संपत्ति से दसियों गुना अधिक हो सकती है। जिस का एक छोटा सा भाग तो पकड़ा गया है, इस का बड़ा भाग जिस का अंदाजा लगाना मेरे लिए मुश्किल है अभी भी उन के पास/ उन के करीबी रिश्तेदारों के पास सुरक्षित होगा। इसी बड़े भाग का बड़ा हिस्सा इन अधिकारियों ने अपने से सम्बंधित मंत्री से संतरियों के बीच भी बाता होगा। तभी तो वे अभी तक महफूज़ थे।

इसी केस में अगर हम कल्पना करे की जितना धन बरामद हुआ है कम से कम  उतना ही धन इन अफसरों ने अपने विशवास पात्र मित्रो तथा रिश्तेदारों के पास सुरक्षित रखा होगा या बेनामी संपत्ति में लगाया हॉगा। जब इतना धन उन लोगो ने अपने पास रखा है तो खुद को बचाने के लिए कम से कम इस का दुगना धन उन ने अपने सहकर्मियों तथा अधीनस्थों तथा अपने वरिस्थ अधिकारियों और राजनीतिज्ञों को भी दिया होगा। इस प्रकार यह आकडा १५००  करोड़ के  आसपास बैठता है। अब केवल वर्ष ११ - १२ की ही बात  तो 1164 afsaron की  kul dhanraashee  1500x1164=1746000 करोड़ रूपए बैठती है। यहाँ कई  बातें  विशेष तौर  से नोट करने वाली है जैसे -
१. यह संख्या केवल उन अफसरों की है जो अपनी संपत्ति का विवरण न देने के कारण सरकारी रडार पर आये। एसा सरकार ने कोई सर्टिफिकेट जारी नहीं  किया है की इन अफसरों के अलावा सभी अधिकारी दूध के धुले हैं और उन सब ने अपनी पूरी आय को नियमानुसार घोषित कर रखा है।   
२.  यह आकडे  केवल आईएस अधिकारियों  के हैं इन में PCS, आईपीएस आयकर विभाग सेल्स टेक्स विभाग, PWD, FCI, RTO, नगरों के स्थानीय निकाय, नगर पंचायत, और MLA, MP,  जो उन को मिलने वाले विकास फंडों से कराये जाने वाले निर्माण कार्यों में २० से ६० % तक कमीशन लेते हैं, और  ना जाने कितने विभाग के अधिकारी शामिल नहीं है. लघभग इन सभी विभागों में भ्रष्टाचार निम्नतम स्तर पर भी पूरी तरह से व्याप्त है। जिन के समभंद में कोई सरकारी आंकड़ा फिलहाल उपलब्ध नहीं है।
इसी क्रम में कर्नाटक के 58, आंध्र प्रदेश [53], पंजाब [48], ओडिशा[47], पश्चिम बंगाल [45], हिमाचल प्रदेश[40], हरियाणा [35], झारखंड [25], असम-मेघालय[23], राजस्थान [22], तमिलनाडु [20], महाराष्ट्र [17], नगालैंड [16], गुजरात[14], बिहार [13], केरल [10], उत्तराखंड व छत्तीसगढ़ [9] और सिक्किम कैडर के आठ अफसरों का नाम है। देश में इस वक्त आइएएस के कुल 6217 स्वीकृत पद हैं जिसमें 1339 प्रोन्नति के पद हैं। इसमें से केवल 4737 पदों पर ही अफसर नियुक्त हैं। प्रशिक्षण एवं कार्मिक विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि संपत्ति का ब्योरा न देने वाले अफसरों के लिए सभी कैडरों को एक सकुर्लर भेज दिया गया है।    वैसे इस प्रकार के नोटिस/सर्कुलरों का कितना असर होता है इस बात का अहसास एक विशुद्ध भारतीय होने के नाते कम सैर कम मुझे थोड़ा बहुत तो है ही। यहाँ तो पूरा आबे का आबा ही भ्रष्ट है क्या आदेश देने वाले नेता  गण क्या आदेश का पालन करने वाले नौकरशाह सभी एक से हैं।

यह हमारा दुर्भाग्य ही है के अंग्रेजों से तो हम राजनेतिक आजादी कब की पा चुके है पता नहीं कब हमें इस भ्रष्ट प्रशाशनिक तन्त्र से मुक्ति मिलेगी। यही  हमारे समाज में भ्रष्टाचार तंत्र का सब से प्रमुख घटक है।                    


२.      यदि देश में उपलब्ध क़ानून के अनुसार ७५ % भी करों की बसूली हो जाए तो भी स्थिति बहुत ही सुखद हो सकती है. किन्तु हमारी मानसिकता कभी भी देश को कुछ देने की नहीं अपितु हमेशा ही सरकार से कुछ लेने की अधिक होती है। तभी तो सरकारी आंकड़ो के अनुसार देश के केवल २.६६ % नागरिक ही दो लाख या उस से कुछ अधिक कमाते हैं। जब की वास्तविकता तो यह है की आज ५५० रूपए तो  प्रति दिन  तो  दिहाड़ी मजदूर भी कमा लेता है जब के उसे मजदूरी देने वाले करोड़ पति अपने आप को कंगाल घोषित कर के केवल सौ - पचास या बहुत हुआ तो हज़ार पांच सौ आय कर दे कर अपने कर्तव्य की इति श्री समझ लेते हैं। हमारे कसबे की बाज़ारों के दूकानदार ही नहीं हमारी गली मुहोल्लों के दुकानदार भी दिन भर में हज़ार रूपए तो कमा ही लेते हैं जिस KAA  PRADARSHAN ये लोग गाहे-ग्बाहे अपने परिवार के   शादी समारोह में पूरी बेशर्मी से करते हैं

यहाँ मुझे एक केस याद आ रहा है। मेरे एक मित्र जो कथित तौर से जूता निमाण में संलग्न हैं एक - दो वर्ष  पहले उन की बेटी  की शादी का समारोह एक तीन सितारा होटल मैं था। दुनिया भर  के अल्लम गल्लम के साथ उन का विचार एक कार भी देने का था। बाकी सब सामान तो ठीक था उसे चाहे कैसे भी खरीद लो नंबर एक में या नंबर दो में किन्तु कार के साथ प्राबलम थी की उस का रजिस्ट्रेशन करवाना पड़ता है अतः न तो इनकम टेक्स  के झमेले के  कारण उन की हिम्मत नंबर दो में कार खरीदने की हो रही थी और  लड़के वाले  न तो दो नंबर की गाडी लेने के लिए राजी थे और ना ही वो गाडी का लालच छोड़ने को तय्यार। अब समस्या बहुत बिकट थी।समाधान के लए मेरे पास आये और बोले “ यार मौड़ी के व्या में देने को एक कार चाहिए खर्चे की कोई बात नहीं कैसे भी कार के लिए बैंक से लोन दिलवा दो”.

मैं उन की वित्तीय स्थिति से वाकिफ था, मैंने कहा की “ क्या प्रोब्लम है, अभी चलो तुम्हारे घर से कुछ कागज़ लेने होंगे “.

कैसे कागज़? उन्हों ने पूंछा

“अमा, कागज़ क्या? पते का प्रमाण, इनकम टेक्स का रिटर्न और २-४ फोटो बस पैसे तो खाते में पड़े ही होंगे”

बाकी सब तो ठीक है पर यह इनकम टेक्स का रिटर्न कहाँ से लाओ गे ?

क्या मतलब? तुम  इनकम टेक्स  नहीं देते?
  ु    
अमा हम इन झमेलों में नहीं पड़ते

क्या मतलब? तुम्हारा इतना बड़ा कारोबार है २-३ सौ  आदमी तुम्हारेकारखानों में काम करते हैं तीस चालीस लाख की शादी कर रहे हो और कहते हो टेक्स नहीं देते? कमाल है यार.

अमा यार हम बे पढ़े लिखे आदमी हैं इन सब लफड़ों से बच  के ही रहते है, वरना ये साली सरकार तो हम को लूट के खा जाय गी

अब मेरे बस का का तो नहीं था के मैं उन को समझाता के सरकार तुम को  नहीं बलके तुम जैसे लोग सरकार ही  नहीं मुल्क को  भी लूट कर खाय जा रहे हो.    

ये कोई देश का एक मात्र केस नहीं है। इस प्रकार के एक नहीं कई  उदाहरण आप के दिमाग में भी घुमड़ रहे होंगे, यह भी हो सकता है की ऊपर लिखी कहानी के हीरो में आप को अपना अक्स दिखाई दे रहा हो। जी हाँ ये एक कटु सत्य है की हमारी राष्ट्र से तो बहुत अपेक्षाएँ है किन्तु उस के प्रति अपने कर्तव्य और दायित्वों के प्रति हम उदासीन हैं। हमारा हमेशा यह ही विचार होता है की देश ने हम को क्या दिया, यह बात तो हम सपने में भी नहीं सोचते के हम अपने देश को क्या दे रहे हैं या क्या दे सकते हैं।

इसी प्रकार का भ्रष्ट आचरण देश के सभी विभागों में आदि काल से चल रहा है। में तो अपने सीमित ज्ञान तथा सीमित संसाधनों से कुछ ही विभागों का उदाहरण दे  सकता हूँ। ये उदाहरण तो केवल संधर्भ मात्र ही है।

विक्रय कर विभाग - देश के सर्वाधिक भ्रस्त विभागों में इस विभाग का नाम प्रमुखता से आता है। वैसे यह विभाग हमारे देश का एक कमाऊ विभाग भी है। इस विभाग के कर्णाधारों की देख रेख में किस प्रकार का भ्रष्टाचार पनपता है।

    व्यापारी अपने द्वारा बेचे माल का नियमानुसार बिल तो बनाते हैं किन्तु उस बिल को एक लिफ़ाफ़े में बंद कर के ट्रांसपोर्टर को इस हिदायत के साथ देते हैं के माल तो ग्राहक तक सुरक्षित पहुँच जाय किन्तु लिफाफा रास्ते में नहीं खुलना चाहिए अर्थात रास्ते में बिल को विक्रय कर विभाग के अधिकारियों से बचा कर रखना होगा। वैसे इस काम में उन को कोई असुविधभी नहीं होती क्योंकी इस प्रकार के लिफाफों को बचाने के लिए वे लोग विक्रय कर विभाग के अधिकारियों हर माह लाखों की भेंट देते हैं। अपनी इस सेवा के प्रतिकार स्वरुप ट्रांसपोर्टर व्यापारी से उचित (?) सेवा शुल्क या भाडा बसूलता है। माल जैसे ही क्रेता की सुरक्षा में पहुंचता है, तुरंत ही विक्रेता को क्रेता तथा ट्रांसपोर्टर सूचित  कर देते हैं की “बंद लिफ़ाफ़े के साथ” माल पहुँच गया है। सूचना मिलते ही विक्रेता उक्त बिल को रद्द कर देता है। होगई  ना सब वल्ले वल्ले भाड़ में गई सरकार।

इस व्यवस्था का एक ‘लाभ”और भी है, अगर खुदा न खास्ता कोई “मुर्ख” अधिकारी ( मुर्ख अधिकारी वो होते हैं जिन से इस लोगो की सेटिग नहीं होती दुसरे शब्दों में इमानदार अधिकारी)  मिल गया और उस ने लिफाफा खोल कर चेक कर लिया तो भी कोई ख़तरा नहीं होगा क्योंकी बिल तो नियमानुसार बना हुआ है ही।

इस खेल को खेलने वाले व्यापारी आम तौर पर  एक जैसी कई बिल बुक एक साथ छपवा कर रखते है किन्तु उन में नंबर नहीं डलवाते। नंबर डालने की मशीन कहीं से भी दो-तीन सौ मिल जाती है। जब जैसी ज़रुरत हो उसी हिसाब से बिल पर नंबर डाल लिया जाता है। मेरे एक दुसरे  मित्र भी इस खेल के बहुत ही पुराने खिलाड़ी हैं। एक बार उन्हों ने एक साथ बारह स्थानों पर एक साथ माल भेजा जिन के बिल “नियमानुसार” बनाए और हमेशा की तरह उन को लिफ़ाफ़े में बंद कर के ट्रांसपोर्टरों को दे दिया। लकिन यहाँ उन से एक छोटी सी चूक हो गई। बारह स्थानों में से ग्यारह स्थान तो आस पास के थे और बारवां शहर के उनशहर से तकरीबन बारह सौ किलोमीटर दूर था। आस पास के बिल उन को पहले   बनान थे जबकी दूर वाला बिल अंत में बनाना था क्योंकी आप पास के बिलों की रिपोर्ट १-२ दिन में आजानी थी किन्तु दूर वाले बिल में कुछ अधिक समय लगना स्वभाविक थे, यहाँ उन से चूक हो गई की उन ने दूर वाला बिल सातवें   नम्बर पर बना दिया। बिलिंग के चोथे दिन तक ग्यारह बिलों के सुरक्षित पहुँचने की रिपोर्ट भी आ गई लिहाजा उन ने हज्म  - ए - मामूल  उन बिलों को कांसिल कर दिया। आठवे दिन रात ११ बजे उन के पास ट्रांसपोर्टर का फोन आया के उस का ट्रक मुगलसराय के पास पकड़ गया है और सेल्स टेक्स अधिकारी ने सभी व्यापारियों को बिल बुक के साथ कल शाम तक बुलाया है। यह सुन कर तो उन के हाथों के तोते उड़ गए। पच्चीस बिलों की किताब पूरी ख़तम हो चुकी  थी और उस में बने सभी बिल भी कांसिल हो चुके थे, किन्तु उसी किताब का बीचों बीच का बिल अधिकारी के हाथों में था।  अब सब से बड़ी समस्या यह थी की एक उसी सीरीज की नई  बिल बुक बनाई जाय और  उस बिल (नंबर) से पहले के सभी बिल  फिर एक बार फर्जी बनाए जाए, पुराणी बिल बुक में से पकडे गए बिल की दूसरी और तीसरी कापी को निकाल कर  नई बिल बुक में उस के नंबर में इस प्रकार फिट किया जाए के किसी को भी इस फर्जी बाड़े पर शक ना हो। यहाँ तक का काम तो कोई भी जिल्दसाज  घंटे भर में ही  कर देगा प्राब्लम तो यहाँ से शुरू होती है क्योंकी इस सब कारिस्तानी के बाद बिल बुक की वाइंडिंग भी की जानी है और सेल्स टेक्स अधिकारे के हाथ में पहुँचने से पहले उसे सूखना भी है। सब काम तो जिल्दसाज़ ने पूरी नफासत से कर दिए पर उस बेचारे के पास १५० पन्नो वाली किताब जिस में  मोटा गत्ता और वाइंडिंग क्लाथ  लेइ से चपकाया गया हो, उसे सुखाने की कोई जुगाड़ नहीं थी। अतः पहले उस किताब को हेयर ड्रायर से फिर इलेक्ट्रिक ओवन में कई राउंड सुखाया गया फिर उसे रात में ही एक छापे खाने में ले जा कर हाइड्रोलिक प्रेस में दवा कर सीधा किया गया। इस सब कबायद के बाद सुबह ८ बजे एक आदमे उस बिल बुक को ले कर अधिकारी के पास गया और उसे बिल के असली होने का सबूत दे कर वापस अपने घर पर लोट आया। “ जय बोलो बेइमान की”

मेरे एक और मित्र हैं वो कम्पेरेटिवली कुछ इमानदार हैं। वो अपने कारखाने में जितना भी माल बनाते है वो शत प्रति शत बिल से ही बेचते हैं, ये बात दीगर है के वो सौ रूपए के माल  का बिल मात्र तीस से चालीस रूपए का ही बनाते हैं बाकी का पैसा वो नगद यानी २ नंबर में लेते हैं। उन की दलील है के उन का माल है वो चाहे कितने  में भी बेचें, इस में सरकार को कोई उजरत होने सवाल ही पैदा नहीं होता। यह उन की इमानदारी की पराकाष्ठा ही है के वो अपना विक्रय कर व आय कर पूरी इमानदारी से समय पर जमा करा कर देश की प्रगति में अपना योगदान  देते  हैं।

3.  हमारे देश की अधिकाँश संस्थाएं जो निर्माण कार्यों से जुडी है उन के लिए हमारे पूर्व प्रधान मंत्री माननीय श्री राजीव गाँधी का कथन - “ सरकार के दिए एक रूपए में से वास्तविक लाभार्थी तक मात्र दस पैसे ही पहुँचते हैं”, आज भी आदर्श वाक्य की तरह उन के विभागों में सर्वमान्य है। मेने इस सम्बन्ध में कई सरकारी बिभागों के  ठेकेदारों से बात कर यह निष्कर्ष निकाला है की उन के द्वारा किये गए वास्तविक कार्य का मूल्य मात्र १ ० से २ ० % ही होता है। शेष बचे पैसों का हिसाब (औसत) निम्न लिखित  है-

TDS  आय कर व व्यापार कर पर                                 १ ०  से १ ५  %
बकोल उन के उन का मुनाफ़ा                                       ३ ५ से ४ ५ %
विभागों के अधिकारियों को दी जाने वाली रिश्वत            २ ० से ४ ० %
निवेश पर व्याज तथा भागा दौड़ी के खर्चे                       १ ५ से २ ५ %
वास्तविक काम की लागत                                           २ ० से २ ५ %   

कई ठेकेदारों को बात चीत के दौरान जब मेने बतायाकी  में सरकारी भ्रष्टाचार पर एक सर्वे कर रहा हूँ तो उनहोंने चुनौती पूर्ण ढंग से कहा की यदि सरकारी अधिकारी रिश्वत न ले तो हम किसी भी काम को वर्तमान सरकारी आंकलन से ६ ० - ७०  %  कम दरों पर कर सकते hain.

अब अगर यही सरकारी भ्रष्टाचार ख़तम तो क्या कम भी  हो जाए तो सरकार के पास लाखों करोड़ रूपए का अतिरिक्त धन जमा हो सकता है जिस से सरकार न केवल आय कर की सीमा पाँच  लाख तक बढा सकती है बल्कि इस के अलावा भी कई जनकल्याण की योजनाओं का संचालन कर सकती है।  



                                                                                                             ...........................सर्वे जारी है 

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