Wednesday, March 31, 2010

एक मज़ाक - नारी स्वतन्त्रता

एक मज़ाक - नारी स्वतन्त्रता





माताओं और बहनों से क्षमा याचना करते हुए निवेदन है की आज कल समाज में एक मानसिकता सी चल परी हैकी नारी और पुरुष को बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए. अपनी सवार्थ पूर्ती के लिए सभी राजनीतिक पार्टी केनेता लोग भी जवानी जमा खर्च करने में पीछे नहीं रहते यह बात अलग है की किसी को महिला वोटों की चिंता है तोकिसी को चूल्हे चोके की. पर दिल से तो कोई इस बात को मानता है और ना ही प्रत्यक्ष समर्थन करने को तय्यारहोगा की महिलाओं को समानता का अधिकार मिले. यही कारण है की इतने साल गुजर जाने की बाद भी महिलासशक्ती करण, तथाकथित नारी मुक्ती आन्दोलन और अब महिला विधेयक की गाढ़ी पंचर पढ़ी है. और आगे वक़्तबताएगा की यह खटारा आगे जाय गी भी या अभी कितने साल और इस राजनेतिक चक्रवात में फँसी रहे गी. परइतना तो तय है की नारी भक्त राज नीतिज्ञ तो इस आग को जलने हे देंगे और ही बुझने। क्यों की उन कीस्वार्थसिद्धि इस आग के जलने या बुझने में नहीं केवल सुलगते रहने में है क्योंकी इसी सुलगती आग में हीराजनेतिक रोटी करारी सिकती है। दयनीय स्थिती तो समाज के उस वर्ग (केवल नारियां) की है जिस का उपयोगइस आग को सुलगाए रखने के लिए किया जा रहा है। यहाँ सब से बढ़ी बिडम्बना यह है की महिला समाज का एकप्रमुख वर्ग जिस से अपेक्षा की जाती है की वो महिला समाज का नेत्रत्व करे खुद अपनी रोटियां सकने में व्यस्त है।वेह वर्ग विशेष करे भी क्या? यह हकीकत तो पूरा नेत्रत्व जानता है की मिलना तो कुछ है नहीं तो क्यों ना अपनीरोटियां ही सेक ली जायं ? वास्तव में दयनीय स्थिति तो तब आती है जब ५०-५० रूपए के लालच में औरतें महिलासशक्ती करण, तथाकथित नारी मुक्ती आन्दोलन और महिला विधेयक की मर्ग मारीचिका के समर्थन में सारे दिनधुप में नारे लगाते हुए इस झूंठ को जीती हैं की अब वो पुरुष के बराबर होने योग्य हो गयीं हैं। इन से भी अद्किहादया की पात्र वे हैं को अपनी कार से, घर की बालकनी से या टेलीविज़न के परदे पर ही इस आन्दोलन को देख करखुश हो जाती हैं।

हम एक समाजिक प्राणी हैं और हमारे समाज ने जो हमारे लिए हजारों साल के अनुभव के आधार पर नियम बनाएहैं, यहाँ समाज ने "नियम बनाए हैं " कहना गलत होगा बल्की कहना तो यह चाहिए की प्रकर्ती के बनाए नियमो कासमाज ने तो मात्र अनुमोदन ही किया है की पुरुष हर हाल में नारी से श्रेष्ठ है। अब बेकार की बहस के लिए आप चाहेतो पुरुष और नारी की तुलना शारीरिक रूप से कर ले, मानसिक रूप से या तुलना का अगर आप के पास कोई दूसरापैमाना हो तो उस से कर ले. जब इश्वर ने ही पुरुष को नारी से हर लिहाज़ में श्रेष्ठ बनाया है तो कुछ लोग पता नहींक्यों खामखाँ ही नारी को सर पे बिठा कर प्राकर्तिक संतुलन को बिगारना चाहते हैं. इन में कोई दो राय नहीं हैं कीप्राकर्ति की सुंदरतम रचनाओं में नारी प्रमुख है. हमारे समाज की शत प्रतिशत नारीओं की यह तो हार्दिकअभिलाषा हो सकती है की पुरुष उन की इज्ज़त करे और उन दो दिल में बसाए, पर पुरुष की बराबरी की या उस केसर पर चढ़ने की अभिलाषी खुद नारी समाज की ही अधिक से अधिक - या % ही होंगी. पुरुष पर राज करने याउस की बराबरी करने के लिए पति को परमेश्वर मानने वाली नारी तो सांस्कारिक तोर पर ही तैयार है नामानसिक या शारीरिक तौर पर. किन्ही कारणों से यदि कोई औरत पुरुष पर हावी हो भी जाय तो इस से उस कोकुछ क्षणिक संतोष तो मिल सकता है किन्तु इस से उस का जीवन एक रिक्तता से भर भर जाता है और वो रिक्ततातब तक ख़तम नहीं हो सकती जब तक वो किसी पुरुष के समक्ष खुद को समर्पित कर दे. इन परिस्थितिओं केविरुद्ध नारी भक्त समाज के पास सिवाय कुतर्कों के कोई भी पुख्ता दलील तो है नहीं। लगभग सभी धर्मो में भी पुरुषको ही श्रेष्ठ बताया गया है तभी अनेकों धार्मिक कर्मकांडों पर पुरुष का ही एकाधिकार माना जाता है, और तो औरकई धार्मिक अनुष्ठानो में तो स्त्री का प्रवेश तक वर्जित होता है। इसी प्रकार कानून भी कई क्षत्रों में पुरुष को हीसक्षम मानता है स्त्रिओं को उन क्षत्रों के लिए अयोग्य माना जाता है। समाज ने भी नारी को कई क्षत्रों में प्रतिबंधितकर रखा है। धर्म, कानून और समाज तीनो एक मत हो कर जब पुरुष को श्रेष्ठ बताते तो अपने आप को कानून धर्मऔर समाज से उपर साबित करने की चाह में नारी भक्त अपना कोंन सा स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं, यह एक शोधका विषय हो सकता है वास्तव में आज नारी को संरक्षण के आवश्यकता है जिसे कुछ स्वार्थी लोग समानता कानाम दे कर पुरे समाज को गुमराह करना चाह रहे हैं।

नारी सदां से पुरुष की आश्रिता रही है. पुरुष का आदि काल से यह कर्त्तव्य रहा है की वो उस का पालन करे और उसकी रक्षा करे. उस पर किसी भी प्रकार का अत्याचार या अन्याय तो पुरुष श्रेष्ठ को शोभा ही देता है और ना हीकिसी भी परिस्थिती स्वीकार्य हो सकता है. संकट के समय सदां ही नारी, चाहे वो सीता हो या द्रोपदी या सूर्पनखा याफिर आज की कोई भी तथा कथित आधुनिका, पुरुष से ही रक्षा की अपेक्षा करती है।


प्राचीन भारतीय विद्वानों के अनुसार इन नौ रहस्यों को बाहरी व्यक्ति, नारी, शत्रु, पड़ोसी और राजा पर विशेष परिस्थितों के अलावा प्रकट नहीं करना चाहिए, क्यों की सामान्यतः ये विश्वासी प्रबरती के नहीं होते। ये अपने अज्ञान, दंभ, कपट या स्वार्थ के कारण कभी भी धोका दे सकते हैं।

1. अपनी उम्र।

2. आय-संपत्ति तथा इसे कमाने का ढंग।

3.इन को पारिवारिक समस्याओं में दखलंदाजी करने की इजाजत न दें। इजाजत देने पर आप इन को परिवार का उपहास करने या समाज में प्रसारित करने का मौका दे देते हैं।

4. अंतरंग संबंध के बारे में कभी इन के समक्ष जिक्र न करें। इन के सामने किसी की शिकायत भी न करें। ये आपकी कमजोरियों का दूसरे के हाथ पहुंचा सकते हैं जो आपकी पराजय और दूसरे की जीत का कारण बन सकती है

5. आपको क्या बीमारी है और आप क्या दवा ले रहे हैं, इस बारे में कभी भी खुलासा न करें। ऐसा करने पर ये लोग गलत मशविरा देंगे और बेकार में ही अवांछित लोगों को जानकारी मिलेगी।

6. धर्म और आध्यात्मिक रुझान अथवा राजा के सम्बन्ध में अपने विचार (राजनीती ) के बारे में इन से चर्चा न करें। यह इन बातों को बहस का मुद्दा बना सकते हैं।

7. आपने कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि, पुरस्कार या सम्मान हासिल किए हैं, तो बिना प्रसंग के इन लोगों को न बताएं। व्यर्थ में ऐसा करने से ये लोग आपके प्रति ईष्र्या या नकारात्मक भाव रखना शुरू कर देंगे।

8. जीवन की किसी अपमानजनक घटना का इन के समक्ष खुलासा न करें। खुलासा होने की स्थिति में ये लोग आपका उपहास करने में सब से आगे रहेगे

9. दूसरों ने आप पर विशवास जताते हुए जो राज या रहस्य बताएं हैं, उनका कभी इन के समक्ष खुलासा न करें। यह विश्वासघात कर उसे जनचर्चा का विषय बना सकते हैं ।


यह बात प्रत्यक्ष भी देखने में आती है कि जो स्त्रियाँ स्वत्रन्त्र होकर रहती हैं, वे प्रायः नष्ट-भ्रष्ट हो जाती हैं। विद्या, बुद्धि एवं शिक्षा के अभाव के कारण भी स्त्री स्वतन्त्रता के योग्य नहीं है।
खुद को इस भरम में रखने के लिए के वो भी पुरुष से कम नहीं है कभी कभी बो भी पुरुष के साथ मैदान में कूद तो परती हैं पर जब वास्तविकता से सामना होता है तो वे भी पुरुष सत्ता को स्वीकार कर या तो समर्पण कर देती हैं या सहयोग की याचना करने लगती हैं जब की उन ही परिस्थितिओं में पुरुष खुद लाढ़ता है और अपनी बुधी, विवेक और बल से विजय भी पाता है.
यहाँ नारी भक्त रानी लक्ष्मी बाई, इन्द्रा गांधी और भी इसी तरह की सेंकरो औरतों का उदाहरण देने में पीछे नहीं रहेगे. यहाँ वे यह भूल जाते हैं या नारीभाक्ती में याद ही नहीं करना चाहते की exemption सब जगह होते हैं समाज मेंजो काम केवल एक या दो नारियां ही कर पाती हैं उन को तो नारीभाक्तों ने महिमामंडित कर दिया पर उस से भीहीन परिस्थतियों में कोई पुरुष वो ही काम करता है तो " ये तो उस का फ़र्ज़ है" कह कर पल्ला झाढ़ लेते हैं. क्यों ? यहाँ समानता वाला उन का माप दंड कहाँ चला जाता. वैसे यहाँ समानता वाली बात है भी नहीं यह बिलकुल सत्याहै की पुरुष का तो "यह फ़र्ज़ है ही" पर यदि कोई नारी भी "इसे " कर ले तो उसे शाबाशी तो मिलनी ही चाहिए उस केउत्साहवर्धन के लिए प्रशंशा और शाबाशी ज़रूरी है. पर इस का नारीभाक्तों द्वारा यह मतलब निकालना की इतनेमात्र से ही वो पुरुष के बराबर हो गई उन के मानसिक दिवालियापन का परिचायक नहीं तो क्या है?

आदि काल से ही हमारे पूर्वजों ने पुरी तरह से सोच विचार कर ही एक पुरुष प्रधान समाज की रचना की है, उस कीदूरदर्शिता के कारण ही आज भी हमारी सामाजिक व्यवस्थाएं उन परम्पराओं का पालन करते हुए फल फुल रहीं हैं. क्या कभी आप ने कल्पना की है की अगर हजारो साल पहले इस बराबरी का मुर्खता पूर्ण विचार हमारे पूर्वजो को जाता तो आज समाज की क्या स्थिति होती. नहीं सोचा ना? तो अब सोच कर देखे, दिमाग का फालूदा बन जायगा और वेह काम करना बंद कर देगा. फिर भी अगर और सोचने का प्रयास किया तो दिमाग का फ्युस उढ जाय गा, कोई नतीज़ा नहीं निकले गा और अगर निकला भी तो कितना विनाशकारी होगा यह लिख पाना तो मुश्किल हैआप खुद ही सोचें.

पहले हमारे समाज को महिलाओं की चिंता नहीं थी या उन के प्रति प्रेम या सम्मान में कोई कमी थी
एसा नहीं है. जितनी चिंता आज महिलाओं की करी जाती है शायाद उतनी ही चिंता हमारे प्राचीन समाज को भी थी. शायद इसी सोच के चलते महिलाओं की सुरक्षा के लिए बाल विवाह तथा सती प्रथा का विकास हुआथा। बचपन सेही नारी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ही उन की बागडोर पुरुष को सोंप दी जाती थी तथा पति की म्रत्यु के बादउसे इस कदर निराश्रित मान लिया जाता था की अब उस का कोई रक्षक नहीं है अतः उसे मर जाना चाहिए। अबयह सोच निर्विवाद रूप से मुर्खता की परिचायक मानी जाती है, पर उस समय अगर लोगों की मानसिकता काअध्यन किया जाय तो यह स्पस्ट हो जाता है की इन सब पाशविक और
मुर्खता पूर्ण सोच के पीछे पुरुष वर्ग की कोईदंडात्मक या प्रतिशोधात्मक भावना नहीं रही होगी अपितु उस ने इस प्रकार के नियम नारी की सुरक्षा को द्रस्तीगत रख कर ही किया होगा।प्राचीन समय में पर्दा प्रथा का चलन भी नारी की सुरक्षा को सर्वोपरि मान कर कियागया होगा। हमारे शास्त्रों में भी नारी को लक्ष्मी के स्वरुप में प्रतिस्था दी गई है और यह निर्विवाद सत्य है की लक्ष्मीकी सुरक्षा का दायित्व सदां से पुरुष पर रहा है। समाज में प्रतिष्ठा और विवाद के मुख्य मान दंड ज़र (धन) जनीनऔर नारी ही हैं। यह तीनो ही स्वयं अपनी सुरक्षा करने में सक्षम नहीं होते अतः इन की सुरक्षा का पूरा दायित्व सदांसे ही मर्द का रहा है। इन से कभी भी समाज ने यह अपेक्षा नहीं की की वे अपनी रक्षा खुद करे।

आज भी पुरे संसार का एक बरा वर्ग इस सोच का ही हामी है की नारी का
आजीवन पुरुष के आश्रय में रहना ही खुदनारी के लिए ही नहीं समाज के लिए भी जरूरी है। इसी व्यवस्था के अन्तरगत नारी का बचपन पिता के, यौवन पति के तथा वृधा वस्था पुत्र के आधीन सुरक्षित मानी जाती है।

बालया वा युवत्या वा वृद्धया वापि योषिता।
न स्वातन्त्र्येण कर्तव्यं किञ्चित् कार्य़ं गृहेव्षपि।।
बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत् पाणिग्राहस्य यौवने।
पुत्राणां भर्तरि प्रेते न भजेत् स्त्री स्वतन्त्रताम्।।

(मनु० 5 147- 148)


बालिका, युवती वा वृद्धा स्त्री को भी (स्वतन्त्रतासे बाहरमें नहीं फिरना चाहिये और) घऱों में भी कोई कार्य स्वतन्त्र होकर नहीं करना चाहिये। बाल्यावस्थामें स्त्री पिताके वशमें, यौवनावस्था में पति के अधीन और पति के मर जानेपर पुत्रों के अधीन रहे, किंतु स्वतन्त्र कभी न रहे।’

कुछ अपवादों के अलावा खुद नारी भी इस व्यवस्थाके बाहर अपने को सुरक्षित समझती है। जितनी चिंतित नारी खुद अपनी सुरक्षा से नहिः होती उस से अधिकपुरुष उस की रक्षा को ले कर चिंतित रहता है नारी की इस निश्चिंतता के मूल में यह ही है की उस ने खुद को पुरुषके आधीन मान कर समर्पण कर दिया है और पुरुष को भी गर्व है की वो नारी के स्वाभेमान , सम्मान और नारीत्वकी रक्षा करने ने केवल पुरी तरह से सक्षम है अपितु इस समभंद में उसे नारी का भी पूरा विशवास प्राप्त है

हमारे समाज का एक सर्वे मान्य नियम है की नारी को पुरुष के बराबर में नहीं उस के पीछे चलना है इस नियम का सख्ती से पालन करने और करवाने में भी नारी ही प्रमुख भूमिका निभाती है. इस नियम को तोढ़ने पर भी सब से तीखी प्रतिक्रया भी समाज के इसी वर्गे से ही आती है. क्यों की हज़ारों वर्षों के अनुभव ने आज नारी को इतना समझदार बना दिया है की अब खुद नारी को उस की इस सोच से डिगाना असंभव सा लगता है की वो कभी पुरुष की बराबरी कर सकेगी.

इतना सब होने के बाद भी महज़ कुछ वोटों की खातिर मुठी भर लोग बेचारी नारी को बरगला कर, उस की इक्षा के विरुद्ध पथ भ्रस्त कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं अतः मेरा परम पूज्य माताओं और बहनों से करबद्धनिवेदन है की वो इन मौका परस्त लोगों के बहकावे में ना आये और अपनी बुधि, विवेक, संसकार, अंतर आत्मा कीआवाज़ और
वास्तविक शुभ चिंतकों के परामर्श से ही कोई निर्णय ले क्यों की यह बहुत ही ज्वलंत सामाजिकप्रशन है जिस का अगर आज ही कोई उचित समाधान हम नहीं खोज पाए तो कल शायद यह विष बेल हमारे पुरीसामाजिक व्यवस्था को छिन्न भिन्न कर देगी। मुझे अच्छी तरह से मालुम है की मेरेविचार पढ़ने के बाद आप का मन भी आंदोलित हो रहा और आप अपनी प्रतिक्रया देने के इक्षुक होंगे, अब चाहे वोमेरे समर्थन में हो या विरुद्ध पर में आप का स्वागत करूँ गा यहाँ मेरा आप से करबद्ध निवेदन है की आप अपनीप्रतिक्रया ज़रूर दे चाहे वो कैसी भी हो पर प्रतिक्रया देने से पहले अपने दिल परहाथ रखें और मुझ से वायदा करें कीआप की प्रतिक्रया आप के दिल की आवाज़ है जो किसी व्यक्तिगत, राजनीतिक, लैगिक, धार्मिक या सामाजिकपुर्वाग्रह्ह से ग्रसित नहीं है.

बस.

2 comments:

सुशीला पुरी said...

बेहद सारगभित और विचारणीय लिखा आपने ....बधाई

shobha said...

मान्याबर अजय जी,

वैसे तो मैं स्वयं भी एक नारी हूँ और समाज शास्त्र की अध्यापिका होने के नाते समाज में नारी स्वतन्त्रता की हामी के तौर पर मुझे मान्यता भी प्राप्त है. जब मेने पहली बार आप के लेख को पढ़ा तो सच बताऊँ खून खोल गया की आज जब के भारतीय नारी नेआकाश को भी अपने कदमो तले रोंद दिया है फिर भी किसी के इस प्रकार के विचार भी हो सकते हैं? मैंने कई बार आप के लेख को पढ़ा, मंशाथी की आप की आलोचना करने का या गरियाने का कोई मौका तलाश करूँ. पर मुझे कहने में कोई संकोच नहीं है की मैं एसा कोई भी बिंदु नहीं तलाश सकी जिस पर कोई भी आलोचनात्मक मगर तथ्य पूर्ण टिपण्णी कर सकूँ,

दिल के ना मानने से क्या होता है पर दिमाग तो मानता है की आप के विचार तथ्य पूर्ण हैं जो सोचने के लिए समाज को नई दिशा देते हैं