Saturday, March 20, 2010


कुछ लोगों की यह सोच है की पुरे ब्रहमांड में केवल मानव ही सेक्स सिर्फ (?) मजे के करता है, तो हम आपको बताना चाहेंगे कि आप की यह सोच गलत हैं भी नहीं है. यह तो सही है की मानव के अतिरिक्त सभी प्राणी सेक्स संतानोत्पत्ति के लिए ही करते हैं यह बात अलग है की इस से उन को आनंद की भी प्राप्ती होती है फिर भी उन का मुख्य उद्देश्य संतानोत्पत्ति ही होता है. वास्तव में एक मानव ही है जिस की बुद्धी इतनी विकसित हो गई है की वो सेक्स को संतानोत्पत्ति, सेहत तथा आनंद के रूप में अलग-अलग परिभाषित करने में सक्षम है. जी हाँ यह चोकने की बात नहीं है अपितु एक वेज्ञानिक सत्य है की आनंद के अतिरिक्त सेक्स स्वास्थ्य के लिए भी बहुत लाभदायक होता है और अगर हर रोज इसका आनंद मिल जाय तो सोने में सुगंध वाली बात हो जाय. अनिद्रा की स्थिति में तो यह न केवल राम वाण दवा ही है. अपितु इस से मानसिक तनाव भी दूर होता है और शरीर से अतिरिक्त कलोरी भी जलती हैं. सेक्स प्रकर्ति के एक नियामत है, और प्रकर्ति की सम्पूर्ण जीवजगत से यह अपेक्सा होती है की वो इस से विमुख न हो। अगर हम एसा करते हैं तो यह न केवल पूरी तरह से अप्रकर्तिक होगा अपितु एसा कर के हम अपनी पोरी प्रजाति को खतरे में डाले गे। क्या आप ने कभी कल्पना की है की यदि यह जीवजगत केवल ३० वर्ष के लिए ही सेक्स से तोबा कर ले तो प्रथ्वी पर जीवो की संख्या में ८० % की कमी आ जाय गी ।

आइए एक निगाह डालें नियमित सेक्स करने के प्रमाणिक लाभ लाभों पर


अभी कुछ समय पहले ही इंग्लैंड के एक विश्वविद्यालय ने अपनी खोज से यह प्रमानित कर दिया है की, जो लोग हफ्ते में दो से चार बार या ज्यादा सेक्स करते हैं, उनको महीने में एक बार सेक्स करने वालों के मुकाबले हार्ट अटैक का खतरा काफी कम हो जाता है। आम तोर पर देखा गया है की लोग किसी मानसिक परेशानी की स्थिती में सेक्स करने से कतराते हैं, ये गलत है, ऐसा कदापि मत कीजिए। तनाव में सेक्स तो आपके लिए आप के लिए राम वाण दवा का काम करेगा। यह तो खुद आप ने भी अनुभव किया होगा कि सेक्स से तनाव और दर्द दूर करने में मदद मिलती है। वैज्ञानिक तोर पर यह स्थापित बात है की सेक्स के दोरान ऑक्सिटोसिन नामक हॉमोर्न सामान्य से पांच गुना ज्यादा शरीर में प्रवाहित होता है, जिस से शरीर में रक्त संचालन तेज़ हो जाता है और इस से शरीर में स्फूर्ति का संचार होता है.

डाक्टरों के अनुसार अगर आप तनाब को सेक्स से दूर रखने में सफल हो जाते हैं इस का अर्थ है की आप अपने दिल को एक सामान्य व्यक्ति से १० गुना ज्यादा जवान रखने में सक्षम हैं. नियमित संभंध बनाने से शरीर की रोग प्रतिरोधात्मक शमता में इजाफा होता है. और शरीर सामान्य सर्दी ज़ुकाम खांसी वायरल बुखार जैसे बिमारिओं का सामना ज्यादा कारगर ढंग से कर सकता है.रोग प्रतिरोधात्मक शमता में इजाफा होने से शरीर की टूटी हुई या बीमार कोशिकाओं की मरम्मत में भी मदद मिलती है।

सेक्स दे दोरान पुरुषों में पुरुसुत्व बढ़ाने वाले हरमोंन - टेस्टस्टेरॉन का स्त्राव बढ़ जाता है जिस से उन में पुरुषोचित गुणों का विकास होता है. और हड्डियों और मॉस पेशेयों को मजबूती बढ़ती हैं. इसी प्रकार महिलाओं में स्त्रीत्व बढ़ाने वाले हरमोंन - एस्ट्रोजन के तीब्र सराब से उन में हृदयाघात की संभावना कम होती साथ ही मूत्र, गर्भाशय जोरों के दर्द बाल झरना तथा त्वचा पर झुर्रिओं जैसी परेशानियों को कम करता है।

सेक्स के समय दिल की धरकन काफी बढ़ जाती है। इससे shareer के सभी अंगों तथा
कोशिकाओं को उच्चा दवाब पर ताजा लहू पहुंचता है। जिस से उन का भरपूर पोशान
होता है, अगर आप ध्यान देंगे, तो पाएंगे कि आप चाहे लाख टेंशन में रहें, लेकिन इसके बाद आपको सुकून भरी नींद आती है। जाहिर है, अगर आपको अच्छी नींद नहीं आ रही और आप इस वजह से परेशान हैं, तो सेक्स को एंजॉय कर सकते हैं। रात को अच्छी नींद आएगी, तो आप ज्यादा स्वस्थ रहेंगे।


आज कल
स्लिम ट्रिम बाडी का क्रेज़ रोजाना बढ़ता जा रहा है, जिसे लोग जिम जा कर या दूसरे उपाय अपना कर वेट कंट्रोल करने की कोशिशों में जुटे हुए हैं, यहाँ भी आप के लिए एक खुशखबरी है. तमाम अध्यानो से यह निर्विवाद रूप से साबित हो चुका है कि रोजाना सेक्स करने से आपको अपनी फालतू चर्बी कम करने में मदद मिलती है। अगर आप इस को आधा घंटा देते हैं, तो ८० -१०० कैलरी बर्न करते हैं। है ना फायदेमंद आम के आम गुथ्लीओं के दाम. !

फिर भी पता नहीं क्यों हम अपने सेक्स जीवन को गंभीरता से नहीं लेते। कोई
समस्या हो तो भी इन संबंधों को लेकर किसी मनो विज्ञानिक के पास जाना तो हम संबंधों की असफलता की पराकास्था का द्योतक मानते है। परिराम ये होता है की विवाहित जीवन निराशाओं और कुंठाओं से भर जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार कुछ ऐसे संकेत हैं जिन को नजरअंदाज करना आपके आपसी संबंधों पर कुठाराघात करने के सामान है. मैं खुद कोई विशेषज्ञ नहीं हूँ फिर भी मेरे अनुभव के अनुसार कुछ इसे मानदंड हैं जिन के वारे मैं पुनर्विचार की आवश्यकता है,:


नीम हकीम

हमारे लिए इस से बड़ी विडंबना क्या हो सकती है की हमारी अशिक्षा के कारण हमारे समाज मैं ऐसे पाखंडी लोगों हैं, जो खुद को योंन रोगों का विशेषज्ञ बताते हैं. साथ ही विज्ञापन के द्वारा ( जो भारत मैं पुरी तरह से गैरकानूनी है) अपना प्राचार कर सेक्स से सम्बंधित कई रोगों का ठेके पर इलाज़ करने का दम भरते हैं जब की वे खुद पुर्णतः अशिक्षित या अल्प शिक्षित होते हैं. ये लोग अपने नीम हकीमी ज्ञान के आधार पर ही समाज मैं उलटे सीधे मिथ्स फैला कर हमारी सेक्स अशिख्सा का भरपूर लाभ उठाते हैं. इन लोगों के अनुसार तो कई सामान्य सी बाते जैसे मस्टरबेशन या नाइटफॉल भी किसी कैंसर या एड्स से कम हानिकारक / हल्की बीमारी नहीं हैं और इन का भी "उन" से इलाज़ करवाना बहुत ज़रूरी है. "उन" के दवा खाने की बनी दवा ४५ दिन मैं गारंटी से आप के रोग (जो वास्तव मैं है ही नहीं) दूर कर देगी. मैं तो समझता हूँ की इन बीमारीओं से अधिक हानिकारक तो हमारी सेक्स अशिख्सा है जिस की कारण हम इन सब से विरक्त रहते हैं जिस से इन पाखंडी लोगो का होंसला और बरता है. सरकार या सम्बंधित अजेंसिओं से इन पर रोक की अपेक्षा करना तो बेकार है. इस से बेहतर तो ये होगा की हम खुद ही नींद से जागे और इस प्रकार के विज्ञापनों का प्रतिकार करे. यहाँ इस बात को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता की हमारे देश में सुशिक्षित योंन रोग विशेषज्ञ डाक्टरों का आकाल सा है, जिस के कारण न तो इन नीम हकीमों की पैदावार कम करना इतना आसान है और न ही एक आम आदमी को इन के चुंगल से बचाना. सफलता चाहे अपेक्षित न भी मिले फिर भी योंन शिक्षा के महत्वा को नकारा नहीं जा सकता।



अपराध भावना

होश संभालते ही हमें यह समझाया जाता है कि सेक्स संभंधि बिचार रखना भी ब्रहमचर्य नाशक, शर्मनाक अधार्मिक और सामाजिक अपराध है तथा असे लोगों का सामाजिक वहिष्कार करना चाहिए। हम उन लोगों को उदहारण और आदर्श के तोर पर देखते हैं जो अपने सेक्स से सम्बंधित विचारों और इक्षाओं को जान-बूझकर समाज से ही नहीं दबाते शायद खुद से भी छुपाते हैं, वे सम्मानीय और आदर के पात्र होते हैं। यदि कोई नौजवान बालक किसी खूबसूरत लड़की को देखकर किसी काल्पनिक संसार मैं खो जाता है, जो की पुरी तरह से स्वाभाविक है, तो उसे खुद अपराधबोध होने लगटा है। खुद महिला सेक्स की इच्छा जाहिर करने से बेहतर अपने आप को अपराधी मान मरने को भी तैयार हो सकती है, पर इस की अभिव्यक्ती ना बाबा ना .........। बहुदा एसा होता भी है की अगर कोई महिला सेक्स की इच्छा व्यक्त करे, तो उसका पति/समाज उसे गलत समझने में देर नहीं लगता है। इस अनुचित अपराध भावना से मुक्ती के लिए किसी विशेषज्ञ के परामर्श से उत्तम पुनर्विचार की आवश्यकता को मानता हूँ, जो आप को ही नहीं पुरे समाज को इस अपराध बोध से मुक्ति दिला सकता है।



हमारा अज्ञान

कई बार लोगों को यह यह भी स्पस्ट ही नहीं होता कि हमारी वास्तिविक समस्या क्या है? और जब वास्तिविक समस्या का ही भान न हो तो कब और किस से क्या कंसल्ट किया जाय इस बात का निर्णय कैसे हो सकता है? उदाहरण के लिए कभी कभी महिलाओं को जनन अंगों से संबंधी कोई समस्या होती है या कोई मूत्र विकार होता, तो उन की प्राथमिकता कोई स्त्री रोग विशेषज्ञ होता है, पर अक्सर देखा गया है की स्त्रिओं में ये समस्या किसी शारीरिक विकार से नहीं अपितु मनोविज्ञानिक कारणों, जिन में पति पत्नी के आपसी , पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों में सामंजस ना होना प्रमुख है, इन परिस्थितीयों मैं बेचारा स्त्री रोग विशेषज्ञ असहाय हो जाता है और उसे मरीज़ की नाराजी से बचने या अपनी फीस की खातिर मरीज़ को कई गेरज़रूरी दवाएयाँ लिखनी परती हैं जो मरीज़ को
लाभ से ज्यादा आर्थिक और शारीरिक नुक्सान पहुंचा सकती हैं. बेहतर तो यह है की इस प्रकार की समस्या के समाधान के लिए किसी प्रशिक्षित रति रोग मनोविज्ञानिक (सेक्स थेरेपिस्त ) से मश्बरा किया जाना चाहिए. वो ही इस का सही विश्लेषण कर के समस्या का सही निदान कर सकता है।



अक्सर देखा गया है की लोगों की सेक्स के वारे में सब से प्रमुख समस्या होती है की उन के साथी का व्यवहार उपयुक्त समय पर सहयोगात्मक नहीं होता. अन्तरंग क्षणों के लिए किसे प्रस्ताव रखना चाहिए और किसे उस का अनुमोदन करना चाहिए? अन्तरंग क्षणों की पूर्व क्रीडा के लिए कितना उपयुक्त समय होना चाहिए जिस से दोनों ही प्रतिभागी आनंदित हो और किसी को भी ऊब का अहसास न हो? पूर्व क्रीडा के बाद मुख्य काम क्रीडा में कोंन अधिक सक्रिय रहेगा और कोंन कम? काम क्रीडा की न्यूनतम आब्रती क्या होनी चाहिए? से साब निर्विवाद रूप से ज्योलंत समस्याए हैं जिन का समाधान तो सब चाहते पर इन का निदान कोई बहारी व्यक्ती करे ये तो शायद कोई भी नहीं चाहे गा. व्यक्ती के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ के लिए यह भी अतिआवश्यक है की इन सब समस्याओं का हल निकले।



यहाँ पर यक्ष प्रशन है - पर कैसे?



मेरे विचार से तो इस का एकमात्र समाधान ये है की दोनों पक्ष साथ बैठ कर आपसी विचार विमश से इस का हल निकाले. क्यों की यही एकमात्र रास्ता है इस लिए या तो अपनी खुशी से इसे अपना कर शांती पूर्वक जीवन यापन करे या आजीवन एक दोसरे पर दोषारोपण करते हुए अपना शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्वास्थ चोपट कर ले. फिर अंत में आप को किसी चिकित्सक की नहीं वकील की ही ज़रुरत रह जायगी

इस के अलावा एक और समस्या है वो है अप्रकर्तिक योंन आनंद प्राप्त करने की चाह. अब जो वास्तु या सुख अप्रकर्तिक है उसे अप्रकर्तिक ही माना चाहिए. ये तो हम सब ही जानते हैं की की प्रकर्ती अपने विरुद्ध बहुत ही कम चीज़ों को बर्दास्त कर पाती है. इस लिए उत्तम तो यही है की हम "उस" के बनाए नियम से बांध कर ही चले और अप्रकर्तिक योंन आनंद प्राप्त करने की चाह से बचे, फिर भी हम मानव सुलभ जिज्ञासा के कारण हमेशा से ही "वर्जित फल" के प्रति आकर्षित रहे हैं और इतिहास गवाह है की हम ने उसे चखा भी है. इस लिए मेरे विचार से ज्यादा बुराई तो इस फल मैं भी नहीं है यदि इसे आपसी सहमती और स्वीकृती "चखा" जाए, बाकी आप खुद समझदार हैं

एसा भी होता है की कोई पुरुष/महिला काम क्रीडा के दोरान अपने सहभागी को पुरे तरह से संतुस्ट नहीं कर पाता. इसी परिस्थिति मैं पहले तो बिना किसी संकोच के आपस में ही इस का समाधान निकलना चाहिए. अगर समाधान न भी निकले तो कम से कम यह तो निर्धारित करने का प्रयास करना चाहिए की आप की समस्या मनोविज्ञानिक है या चिकित्सीय. मेरा विशवास करे की इस प्रकार के ८०% से अधिक मामलो में समस्या मनोविज्ञानिक होती है जिसे आपसी समझदारी से बिना किसी खर्च के ठीक किया जा सकता है. अगर आप किसी मनोविज्ञानिक के पास जाते भी हैं तो वो भी कोई दवा तो देगा नहीं वो भी आप को आपके आचार विचार में सुधार लाने को कहे गा. यह तो आप खुद भी अपने बुधि विवेक और आपसी विचार विमश से कर सकते हैं. १५ दिन इस नुस्खे को आजमा कर देखे लाभ ज़रूर होगा।



विवाह एक सामाजिक आवशकता

हमारे परिवेश/समाज में विवाह की ज़रूत केवल वासना पूर्ती के लिए ही नहीं मानी जाती अपितु इसे एक धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारी के रूप में जाना जाता है. हमारे समाज में भी कुछ लोग विभिन्न कारणों से विवाह पूर्व सम्बन्ध रखते हैं ये धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक ही नहीं कानूनी अपराध की श्रेणी में आते हैं. हालांके सम्बंद्कित व्यक्ती इस के समर्थन में अपनी अपनी दलीलें देते हैं, पर इसे किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं मना जा सकता है. कुछ स्थितिओं में यदि सम्बंधित व्यक्ती शादी के बाद इस से तौबा कर ले तो उस क्षमा किया जा सकता है. पर कुछ स्थितिओं में जब इस प्रकार के सम्बन्ध व्यक्ति विशेष की मजबूरीबन जाय और वो दिल से चाहता की इस क्लेश से निकले तो उसे मनोविज्ञानिक, डाक्टर या पुलिस से से मिलने में झिझक महसूस नहीं करनी चाहिए अनेतिक संबंधों की श्रेणी में कई और भी सम्बन्ध आते हैं इन के वारे में किसी भी प्रकार मुगालता पालना हानीकारक है हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए की सेक्सुअलिटी में भी बाइसेक्सुअलिटी और होमोसेक्सुअलिटी जैसी कई अंधेरी गलियां होटी हैं। इन में गुम होने से बेहतर इन से बच के निकलना है. .

यह एक परम सत्य है की सेक्स एक नितांत व्यक्तिगत विषय है तथा इस मैं हर एक की अपनी अलग प्राथ्मिक्ता, पसंद व् स्वाद हो सकता है. इस लिए इस विषय में किसी को कोई राय देने वाला (मेरे समेत) अकल्मन्द तो हरगिज़ नहीं कहलायगा, हाँ राय लेने वाला जिज्ञासु या अकल्मन्द ज़रूर हो सकता है. वास्तव मैं सेक्स के संभंध में बिस्तृत ज्ञान प्राप्त करने के लिए जिज्ञासु होना, अज्ञानता वश किसी अपराध भावना या हीन भावना से ग्रसित होने से लाख गुना बेहतर है. यह भी ज्ञान का एक गहरा समंदर है जिस पर हमारे ऋषी मुनिओं और पुरखों ने शास्त्रों तक की रचना कर दी है. तो हम खुद को या अपने समाज को इस से वंचित कैसे रख सकते हैं. इस सम्बन्ध में और ज्ञान प्राप्त करने के लिए आपसी विचार विमश, नियंत्रित मन से आत्म चिंतन, स्तरीय साहित्य का अध्यन, अथवा किसी ज्ञानी या सेक्स विशेषज्ञ से सलाह करने की भावना को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए

Wednesday, March 17, 2010


हज़ार साल जियो





होली पर में ताऊ जी से मिलने गया. जब मेने उन के चरण स्पर्श किये तो उन ने मुझे आशीर्वाद दिया " हज़ार साल जियो " सुन कर में खुश हो गया. लेकिन बाद में जब मेने सोचा की अगर ताऊ जी काआशीर्वाद सच में सच्चा साबित हो गया तो इतने साल तक में करूँ गा क्या? और उन ने आशीर्वाद में ये तोक्लीअर किया नहीं की जियूं कैसे. आज के इस दौर में ६०-७० साल जीना भी चाँद पर जाने से अधिककठिन है तो फिर १००० साल की तो सोच के ही पुरे शरीर में झुरझुरी सी आ जाती है.

प्रश्न १००० साल जीने का नहीं है प्रश्न तो यह है की जिया कैसे जाय? क्या दुनिया ने कुछ कर दिखाने केलिए लम्बी उम्र ही सब कुछ होती है? कम से कम मैं तो एसा नहीं समझता. अभी कुछ माह पहले ही कैलाशी काका तकरीबन ९५ साल के हो कर मरे, पर आज जब कोई उन का ज़िक्र करता है तो सुनने वाला अक्सर यह पूंछ लेता है की कोंन कैलासी? आज उन को मरे ६ महीने भी नहीं हुए की समाज/लोगों उन को बिसरा दिया. और फिर क्यों न समाज उन को भुला दे आखिर किया भी क्या उन्हों ने अपने ९५साला जीवन में? अपने परिवार को ही तो पाला, इस में नया क्या है? सब पालते हैं. समाज के लिए क्या किया? अगर वो १०-२०-५० साल और भी जी लेते तो भी क्या कर लेते? इतने साल धरती kaa    बोझ बढ़ाने या १०-२० मन अनाज खाने के अलावा शायद वो कुछ कर भी नहीं सकते थे, हकीकतन वो इतने सक्षम हीनहीं थे की अपने स्वार्थ से हट कर समाज को कुछ देने का प्रयास भी करते. इस का दोष अकेले उन कोदेना उन के साथ अन्याय करना है. हम सब ही तो इन्ही के जैसे है. अगर अपने गिरेबान में झांकें तो हमपायं गे की हम सब ही नहीं हमारे स्वर्गीय पूर्वज भी कैलासी काका से कोई अलग तो नहीं हैं. यहाँ पर में स्पस्ट करना चाहूँगा की मेरा उद्देश्य स्वर्गीय पूर्वजों का या उन के द्वारा छोरी गयी विरासत का अपमान करना हरगिज़ नहीं है. पर हे भी निर्विवाद सत्य है की मेरे पूर्वज जो भी छोढ़ गए वो मेरे लिए है उस सेसमाज या देश का कोई हित तो होने वाला नहीं है, फिर क्यों ये समाज उन को याद रखे? में भी जो छोरकर जाऊं गा वो मेरे परिवार के लिए होगा देश या समाज को तो उस में से फूटी कोढ़ी भी नहीं मिले गी. फिर अगर में समाज से ये अपेक्षा करता हूँ की मेरे मरने के बाद मुझे याद रखे तो ये मेरी भूल होगी.

हम सब को बहुत अच्छी तरह से पता है की हम एक मुसाफिर की तरह से हैं जो दुनिया के प्लेटफार्मअपनी गाढ़ी (मौत) का इन्जार कर रहा है. किसी की ट्रेन जल्दी आ जाती है और किसी की देर में आती है. पर जिस की भी ट्रेन आजाती है वो चला जाता है. प्लेटफ़ार्म पर शायद उस का कोई निशाँ बचता है. हाँ, पर जिस की भी ट्रेन ज्यादा देर से आती है वो प्लेटफार्म पर कुछ न कुछ गन्धगी जरूर छोर जाता है. यहाँमें अपना ही उदाहरण देता हूँ - एक बार मुझे सपरिवार कहीं जाना था ट्रेन ४ घंटे लेट हो. अतः मेरी पत्नीने प्लेटफार्म पर चादर बिछा दी हम सब वहीं पर बैठ गए. कुछ देर बाद मेरे पुत्र ने खाने की फ़र्माएश कीतो पत्नी ने कागज़ की प्लेट में पुरी सब्जी निकाल कर उसे देदी. देखा देखी मेने भी माग लिया. मुझे देने केबाद उस ने खुद भी ले लिया. नतीजतन ३ कागजी पलट ३ गिलास १ पानी की खाली बोतल और एक पूराअखबार और काफी सारी जूठन फिकने को तैयार थी. तभी अचानक ट्रेन आ गई. हम ने चादर औरसामान समेटा और ट्रेन में बैठ गए. आज जब में यह लेख लिखने बैठा तो अचानक मुझे यह वाकया यादआ गया और में सोचता हूँ की अगर में प्लेटफार्म पर इतनी देर रुक कर ट्रेन का इंतज़ार नहीं करता तोमेने वहां इतनी गन्धगी भी नहीं छोडी होता. शायद गन्धगी फैलाते समय में यह भूल गया था की जब ट्रेन (मौत) आयेगी तो मुझे अपनी फेलाई गन्धगी ( अपने पापों ) को समेटने का समय नहीं मिलेगा खेर मैं तो चला गया पर अब मुझे मालूम है की मेरे जाने के बाद जो भी वहां से गुजरा होगा वो ही मेरी फैलाई गन्धगी पर थूक कर ही गया होगा. वहां से जाने के बाद अब में सोचता हूँ की मेरे प्लेटफार्म पर रुकने सेजीने से) स्टेशन को (दुनिया को) क्या लाभ हुआ? अपने जाने (मरने) के बाद मेने अपने सह्यात्रिओंसमाज) को अपने वारे में सोचने के लिए क्या दिशा दी? ( ( ( 

यहाँ यह स्पस्ट हो जाता है की कुछ करने के लिए लंबा जीवन जरूरी नहीं होता. विवेकानंद,अभिमन्यु, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव या चंदर शेखर आज़ाद कितने साल जिए थे? इन सभी को तो ३ दशक सेज्यादा जीवन भी नहीं मिला, जीने के लिए. अगर इन में से भी बाल्यावस्था का ढेर दशक निकाल दे तो इन का कार्यशील जीवन मात्र १० - १२ साल ही बचता है, अभिमन्यु का तो इतना भी नहीं बचा. पर फिरभी इन की उपलब्धीयों के वारे कोई प्रशन चिन्ह नहीं लगा सकता. क्योंकी यहाँ जीवन की अवधी औरसार्थकता की चर्चा हो रही है अतः इन की उपलब्धीयों के वारे यहाँ पर चर्चा करना विषय वास्तु सेभटकना होगा.

कहने का अभिप्राय स्पस्ट है की जीवन की सार्थकता जीवन के लंबा होने से अधिक जीए गए जीवन शैली में है. सार्थक जीवन वही कहलाता है जिस जीवन को स्वार्थो से परे हट कर दूसरों के लिए जिया जाय. जब यह बात हमारी समझ में आजे गी तब ही हम निस्वार्थ, परोपकारी और चिर्स्मार्नीय जीवन शैली अपना सके गे और अपने से छोटों को लम्बे और सार्थक जीवन का अंतर समझा कर उन्हें एसा जीवनजीने की प्रेरणा दे सकें गे जिसे लोग सदिओं तक याद रख सकें.

Monday, March 15, 2010

नव बर्ष शुभ हो

चेत्रा शुक्ल प्रतिपदा
अर्थात
भारतीय नव वर्ष

विक्रमी संवत २०६७ का शुभ आरम्भ ( March 16th 2010)

भारतीय संस्कृति श्रेष्ठता की उपासक है. येही संस्कृति समाज में हर्ष उल्लास जागाते हुए हमें एक सही दिशा प्रदान करती है, जिसे हम समय समय पर उत्सव के रूप में मना मना कर अपनी संस्कृति के प्रणेताओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं. अपने स्वाभिमान और रास्त्र प्रेम को जागाने वाला एसा ही प्रसंग आता है चेत्रा मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को जिस दिन से हमारा हिन्दू नव वर्ष प्रारम्भ होता है.

आइये इस दिन की महानता से सम्बंधित प्रसंगों को देखते हैं :-

१. यह दिन काल गरना का प्रथम दिन है, अर्थात इस दिन सूर्योदय के साथ ही ब्रहमा जी ने स्रष्टी की रचना प्रारंभ की थी.
२. बिक्रमी सम्बत का प्रथम दिन - कहा जाता है की उसी राजा के नाम पर सम्बत प्रारम्भ करने का प्रावधान है, जिस के राज्य में कोई दींन दुखी न हो, कोई चोर या अपराधी न हो, किसी भी नागरिक को किसी दुसरे से या राजा से कोई शिकायत ना हो तथा जो चक्रवर्ती राजा हो. इसे ही राजा विक्रमादित्या का राज्याभिषेक इसी दिन २०६७ बर्ष पूर्व हुआ था
३. मर्यादापुरुषोत्तम भगवान राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अपने राज्याभिषेक के लिए चुना था.
४. नवरात्रि स्थापना : शक्ति और भक्ति के ९ दिन अर्थात नवरात्री स्थापना का पहला दिन भी यही है. यही दिन प्रभु राम के जनम दिवस के नौदिव्सीय उत्सव का प्रथम दिन भी है.
५. सिख संप्रदाय के द्वतीय गुरु श्री अंगद देव का प्रकाटोत्साब (जन्म दिवस) भी इसी शुभ दिन होता है.
६. मानव सामाज को श्रेष्ठतम मार्ग पर ले जाने के लिए आर्या समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन आर्या समाज की स्थापना की थी.
७. सिंध प्रान्त के प्रसिद्द समाज रक्षक वरुनावातार संत श्रोमणी झुलेलाल ने भी इसी पवित्र दिन भूलोक पर प्रकट हो कर हमें कृतार्थ किया था.
८. राजा विक्रमादित्या की भांति शालीनवाहन ने हूणों को परस्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित कर आज के ही दिन से शालीनवाहन संवत्सर का शुभारम्भ किया था
९. ५११२ वर्ष पूर्व युदिश्थिर राज्याभिषेक के साथ ही आज के दिन से ही युगाब्द संवत्सर का शुभारम्भ हुआ था

प्रकर्ति भी इस अवसार पर आनंदित हो आशीर्वाद स्वरुप हमारा साथ देने को वातावरण वसंत यानी उल्लास, उमंग और पुष्पों की सुगंध से भर देती है. यही वो समय है जब इश्वर किसानो को उन की महेनत का प्रतिफल दे कर उपकृत करता है.

क्या १ जनवरी के साथ एसा एक भी प्रेरणा दायक प्रसंग जुरा है, जो हमारे मन में स्वाभिमान देशप्रेम या श्रेष्ठता का भाव पैदा करने में सक्षम हो?

आज देश करबत बदल रहा है. सदिओं की निद्रा को दूर कर हिन्दू समाज भी अंगराई ले रहा. हिन्दू की परिभाषा में वे सभी लोग आते हैं जो भारत माता को अपनी माता, देश में महापुरषों को अपना पूर्वज तथा देश की संस्कृति के मूल तत्वके आगे नत मस्तक हैं.

सत्य एक है, पर उसे लोग भिन्न भिन्न नामो से जानते हैं. जिस प्रकार उस के नाम भिन्न भिन्न हैं उसी प्रकार परम सत्य तक पहुचने के मार्ग भी अलग अलग हैं. वे सभी मार्ग सत्य हैं आवश्कता केवल उन में से किसी एक मार्ग को चुन कर उस पर पुरी सत्य निष्ठा के साथ चलने की है. आज आवश्कता इस बात की है की हम सब साथ चले, अपने अपने रास्ते पर चले, अपनी संस्कृति का पालन करे, एक दूससरे का स्सह्योग करें अपने हिन्दू होने का गर्व करे तभी हम दुनिया में अपनी पताका सब से ऊँची फहरा सकें गे.

आओ हम सब मिल कर अपने हिन्दू होने पर गर्व करे


नव बर्ष शुभ हो